top of page
Search

ऋणात्मक आयन एवं उनका उत्पादन

किसी भी समय वायु में कुछ कण विद्युत आवेश से युक्त होते हैं, जिन्हें आयन कहते हैं। वायुमंडल में आयन तब बनता है जब अणु या परमाणु में एक इलेक्ट्रॉन को बाहर निकालने के लिए पर्याप्त ऊर्जा उसे प्राप्त हो जाती है। ऋणात्मक आयन को एन. ए. आई. भी कहते हैं । एन. ए. आई. वह कण हैं जो एक इलेक्ट्रॉन प्राप्त करते हैं जबकि धनात्मक वायु आयन वह कण हैं जो अपना एक इलेक्ट्रॉन खो देते हैं | इनके उत्पादन के प्राकृतिक अनेक ऊर्जा स्रोत हैं जैसे: 1. वातावरण में व्याप्त ब्रह्मांडीय किरणें 2. पराबैंगनी किरणों से युक्त धूप 3. गरज और बिजली की कड़कन 4. जलधारा अथवा जलप्रपात 5. वृक्ष -वनस्पति ।


हमारे वायु मंडल में यूरेनियम, रेडियम, एक्टिनियम इत्यादि अनेक तत्व व्यापक रूप से मौजूद हैं जो कि वायुमंडल में अल्फा, बीटा, गामा इत्यादि किरणों का उत्सर्जन करते हैं। यह किरणें हवा को आयनित करती हैं| इस प्रकार पृथ्वी के वातावरण में ब्रह्मांडीय किरणों के द्वारा आयनीकरण होता रहता है। इनके द्वारा महासागरों में भी ऋणात्मक आयन उत्पन्न होते हैं | इन किरणों के द्वारा लगभग 500 प्रति घन सेंटीमीटर तक ऋणात्मक आयन का उत्पादन होता है।

जंगलों में अथवा समुद्र और झरनों के किनारे ऋणात्मक आयन की संख्या लगभग 200 से 400 प्रति घन सेंटीमीटर तक होती है । यह ऋणात्मक आयन के प्राकृतिक उत्पादन का स्रोत है । अतः वनों में अथवा समुद्र के किनारे जाने पर हमें अच्छा लगता है तथा मन शांत होता है।


ऋणात्मक आयन उत्पन्न करने का एक स्रोत यज्ञ भी है। देखा गया है कि जहां पर यज्ञ होता है, वहां बैठने वालों को अच्छा लगता है और अच्छे स्वास्थ्य की अनुभूति होती है। यज्ञ के द्वारा बहुत ज्यादा ऋणात्मक आयनों की उत्पत्ति होती है। इसको देखने के लिए कई प्रयोग किए गए जिसमें से दो प्रयोग निम्न दर्शाए गए है।

1. पहला प्रयोग चंद्र विहार, नई दिल्ली में श्री मुकेश कुमार द्वारा 22 नवंबर 2020 को किया गया। इस प्रयोग में यज्ञ के थोड़ा पहले से ऋणात्मक आयनों का उत्पादन मापना प्रारंभ किया गया। यज्ञ के दौरान देखा गया कि जैसे ही अग्नि स्थापना हुई वैसे ही ऋणात्मक आयनों की संख्या बढ़ने लगी। आहुतियों के साथ इनकी संख्या में और भी बढ़ोतरी दिखाई दी । यज्ञ समाप्त होने के बाद ऋणात्मक आयनों की संख्या भी कम होती गई और अग्नि शांत होने के पश्चात वह अपने पूर्व स्तर पर आ गई थी | यह देखा गया कि ऋणात्मक आयनों की संख्या 100 से बढ़कर यज्ञ के बीच में 1500 तक हो गई थी जो कि अन्य प्राकृतिक स्रोतों से कई गुना अधिक थी।



नोट: ऋणात्मक आयन संख्या= उपरोक्त संख्या x 103


नोट: ऋणात्मक आयन संख्या= उपरोक्त संख्या x 103

2. दूसरा प्रयोग श्री अभिषेक कुमार द्वारा संगम विहार में नवंबर 2020 में किया गया था। प्रयोग के दौरान देखा गया कि ऋणात्मक आयनों की संख्या 350 से बढ़कर 2300 तक हवन के बीच में हो गई थी।

उपरोक्त दोनों प्रयोगों में लगभग एक जैसे ही नतीजे दिखाई पड़े जिनसे यह सिद्ध होता है कि हवन के दौरान ऋणात्मक आयन बहुतायत संख्या में उत्पन्न होते हैं, जिनके कारण यजन कर्ताओं को अच्छा लगता है और वे स्वस्थ महसूस करते हैं।

31 views0 comments

Recent Posts

See All

यज्ञोपैथी अनुभव : रश्मि प्रिया

मेरा नाम रश्मि प्रिया है | मैं अपने यज्ञ सम्बंधित कुछ अनुभव शेयर करना चाहती हूँ| मेरी शादी को सात साल हो गए और मेरे दो बच्चे हैं| मैं अपने सिर सम्बन्धी कई समस्याओं से परेशान रहती थी| कहीं भीड़ में जाना

यज्ञोपैथी : यज्ञ द्वारा मधुमेह के रोगियों की चिकित्सा

गायत्री चेतना केंद्र, नोएडा में 11 डायबिटिक रोगियों पर अप्रैल 2019 में एक माह का उपचार सत्र कार्यान्वित किया गया | इसमें निर्धारित प्रारूप के अनुसार 1 घंटे के उपचार की प्रक्रिया अपनाई गई जिसमें औषधीय

कैंसर का इलाज करने के लिए वेदों में वर्णित यज्ञ चिकित्सा

प्राचीन आयुर्वेद ग्रंथों के विद्वानों के अनुसार, एक सौ और आठ प्रमुख नाभिक केंद्र हैं जो मानव शरीर के अंदर सबसे महत्वपूर्ण प्राण ऊर्जा का स्रोत और (महत्वपूर्ण आध्यात्मिक ऊर्जा) के भंडार हैं। इनमें से क

Comments


bottom of page